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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 8, ISSUE 2 (2022)
श्रीमद्भगवद्गीता में ध्यान-योग के साधन
Authors
अजित कुमार
Abstract
गीता के छठे अध्याय में ‘ध्यान-योगी’ के लक्षण बताये गए हैं। वे लक्षण क्या हैं। उस ध्यान-योगी का व्यवहार कैसा होता है? भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-‘‘जिस प्रकार वायु-रहित स्थान पर रखा हुए दीपक की लौ कांपती नहीं है, ठीक उसी प्रकार जिसका चित्त वश में है और जो आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ने के प्रयत्न कर रहा है, वह ध्यान-योगी है। जिस अवस्था में पहुँचकर, योग के अभ्यास द्वारा चित्त निरूद्ध और उपराम को प्राप्त हो जाता है, जिस अवस्था में अपनी आत्मा के द्वारा ही आत्मा (परमात्मा) को पहचान कर अपने में सन्तोष पाता है, जिस अवस्था में पहुँचकर इन्द्रियों से न प्राप्त होने वाले किन्तु बुद्धि से प्राप्त होने वाले परम सुख को अनुभव करता है, जिस अवस्था में स्थित होकर यह अपने तत्त्व (अपने मूल) से चलायमान नहीं होता, डिगता नहीं है, जिसे पा जाने पर यह समझता है कि इससे बड़ा दूसरा कोई लाभ नहीं है और जिसमें स्थित हो जाने पर यह बड़े से बड़े दुःख से भी विचलित नहीं होता है, वह ध्यान योगी है।’’1 इस ध्यान-योगी की स्थिति को प्राप्त करने के लिए कौन-कौन साधन हैं, उन सभी साधनों का विस्तृत-विवेचन यहां किया है।
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Pages:35-39
How to cite this article:
अजित कुमार "श्रीमद्भगवद्गीता में ध्यान-योग के साधन". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 2, 2022, Pages 35-39
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