Logo
International Journal of
Hindi Research
ARCHIVES
VOL. 8, ISSUE 2 (2022)
प्रसाद की कविता का मूल स्वर
Authors
आशुतोष कुमार द्विवेदी, पद्मिनी द्विवदी
Abstract
प्रसाद का विश्वास है कि इतिहास का पुनर्जागरण राष्ट्रीय उत्थान के लिए आवश्यक है। देश देश की परम्परा सभ्यता और संस्कृति उसे नवजीवन प्रदान करती है। प्रसाद ने सांस्कृतिक पुनरूत्थान का प्रयत्न किया। अपने व्यक्तिवादी रूप में भी वे वेदना, करूणा तथा प्रेम - दर्शन की अभिव्यक्ति करते हैं। क्रमशः एक उच्च भावभूमि पर जाते हुए प्रसाद आत्मवाद आनन्दवाद को अपनाते हैं। ’कामायनी’ का कवि अपनी विचार धारा को आध्यात्मिक कलेवर प्रदान करता है, यद्यपि उसका व्यवहारिक पक्ष सबल है। इस प्रकार काव्य में प्रसाद की विचारधारा अनेक दिशाओं में प्रवाहित प्रतीत होती है।
Download
Pages:63-64
How to cite this article:
आशुतोष कुमार द्विवेदी, पद्मिनी द्विवदी "प्रसाद की कविता का मूल स्वर". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 2, 2022, Pages 63-64
Download Author Certificate

Please enter the email address corresponding to this article submission to download your certificate.