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VOL. 8, ISSUE 4 (2022)
उषा प्रियंवदा जी के उपन्यासो में कामकाजी महिलाओ की समस्या
Authors
लल्ली त्रिपाठी, अमित शुक्ला
Abstract
‘‘नारी जीवन और उसकी समस्याएँ सदा से ही साहित्य के विषय वस्तु के रूप में ग्रहण की गई है। समस्याएँ अधिकांशतः सामाजिक क्षेत्र में जन्म लेती है और उनका अधिकतर सम्बन्ध, नारी जाति से है। विविध समस्याओं और कुप्रथाओं ने नारी जाति को बड़ी दीनावस्था में पहुचा दिया है इसी समाज ने कभी नारियों को पर्दा प्रथा के नाम पर घर में बंदी बना के रखा तो कभी दहेज के नाम पर उन्हें जिन्दा जलाया गया। बाल विवाह से विधवा समस्या और वेश्या समस्याओं का जन्म हुआ स्त्री की दयनीय स्थिति का कारण समाज में जहा उनका स्त्री होना है, वहीं इन समस्यों का जुड़ना उसकी नियति बन गई है। जब वह घर में कैद भी तब भी उसकी ढेरों समस्याएँ थी और आज बाहरी दुनिया में भी उसका, पूरी तरह से शोषण किया जा रहा है। वास्तविकता यह है, कि समय बदला है लेकिन नारी की समस्याएँ वहीं के वहीं है सिर्फ उसका रूप और नाम बदला है। साहित्यकार इसी समाज का साक्षी है। अतः इन सभी परिस्थिति का सीधा असर साहित्यकार पर पड़ता है और इसी से वह जो अनुभव करता है उसी को अपनी रचनाओं में वर्णित करता है। उषा प्रियंवदा जी ने इसी समस्याओं को केन्द्र में रखकर रचनाएँ की है। इन्होंने नारी के मन की गहराई मे जाकर नारी समस्याओं के प्रति उदासीनता को छाँटकर एक नई दृष्टि से नारी के अंतर्मन को झाँकने का प्रयास किया है। उषा जी ने आधुनिक युग की शिक्षित नारी और उससे जुड़ी समस्याओं को अपनी रचनाओं में मुखरित किया है । अपने व्यक्तित्व के प्रति सजग ऐसी आज की आधुनिक नारी के जीवन में आने वाली ऊब, घुटन, संत्रास तथा अकेलेपन से जीवन में आने वाली रिक्तता तथा अपने अस्तित्व की पहचान बनाने के लिए संघर्षशील नारी का जो चित्रण उन्होने किया है वह हर पाठक को नारी जीवन तथा उसकी समस्याओं के प्रति सोचने को बाध्य कर देता है।
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Pages:90-91
How to cite this article:
लल्ली त्रिपाठी, अमित शुक्ला "उषा प्रियंवदा जी के उपन्यासो में कामकाजी महिलाओ की समस्या". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 4, 2022, Pages 90-91
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