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VOL. 8, ISSUE 4 (2022)
गढ़वाली लोकगीतों में स्त्री छवियाँ
Authors
अमिता प्रकाश
Abstract
गढ़वाल वर्तमान में संपूर्ण भारत का एक लघु संस्करण है, जिसमें देश के विभिन्न भागों से आकर लोग बसे और धीरे धीरे यहीं के होकर रह गए। प्रकृति से घनिष्ठ संपर्क व लगाव के कारण यहाँ के लोगों ने प्रकृति के सुर में सुर मिलाकर उन्मुक्त कंठ से गीत गाये हैं। यहां का जनमानस कभी प्रकृति के रूप पर आसक्त होकर, तो कभी उसकी शक्तिओं से अभिभूत होकर, उसको देवी देवता के रूप में अपने लोकगीतों में पूजता है, तो वहीं अपने सुख-दुखों से लेकर सामान्य पशु पक्षियों के सुख दूखों को अभिव्यक्ति देते गढ़वाली लोकगीतों की रचना करता है। गढ़वाली लोक गीतों को कई श्रेणियों-उप श्रेणियों में विभक्त किया गया है। शैली के आधार पर एवं विषय के आधार पर वर्गीकृत- तंत्र-मंत्र, देवी देवता, पूजा त्योहार आदि के गीतों के निर्माण में यद्यपि नारी की भूमिका सीमित रही है किंतु खुदेड़ गीत, ऋतु गीत तथा श्रम गीत पूर्णतः नारी हृदय से उठीं तरंगें हैं। लोकगीत स्त्री वेदना की अभिव्यक्ति के अत्यंत मार्मिक दस्तावेज होते हैं और इनमें स्त्री स्वर की ही प्रधानता रहती है। गढ़वाल के प्रेम विषयक लोकगीत जहां एक ओ गढ़वाली नारी के रूप और पुरुष की सहृदयता का मनोरम चित्र उपस्थित करते हैं, वहीं खुदेड़ गीतों, श्रम गीतों, व ऋतु गीतों में उसके जीवन के दुख-दर्द व जीवन के कटु अनुभवों की झलक मिलती है।
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Pages:47-51
How to cite this article:
अमिता प्रकाश "गढ़वाली लोकगीतों में स्त्री छवियाँ". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 4, 2022, Pages 47-51
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