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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 9, ISSUE 1 (2023)
निराला का प्रगतिशील काव्य
Authors
डॉ. तबस्सुम खान, वेदिका यादनलाल बनोठे
Abstract
आज की कविता उन्नीसवीं सदी की कविता से अलग हो रही है। कविता का रूप, भाव, गेयता, अन्तर्गुण सबके सब परिवर्तित हुए हैं। गत एक सौ वर्षों में संसार, मनुष्य और उसका जीवन पूर्ण रूप से ता में भी दर्शनीय है। आधुनिक परिवर्तित हुआ है। इस परिवर्तन की प्रतिबिंब उस कवि कविता के कुछ गुण इस प्रकार हैं। 1ण् काव्यात्मक भाषा का अभाव। 2ण् प्रतीक, तुक और छंद से छूट। 3ण् प्रतीकों का प्रयोग केवल सामान्य 4ण् सामान्य बोलचाल की भाषा का प्रयोग। 5ण् प्रपंच के समस्त विषयों से हटकर केवल सामान्य परिकल्पनाओं के आधार पर विषय चुनाव। 6ण् मनोवैज्ञानिक प्रतीकों का प्रयोग। 7ण् दूसरी भाषाओं की शब्दावली कहावतें आदि का प्रयोग। आधुनिक कविता के इन गुणों के आधार पर निराला काव्यों में प्रगतिशील चेतना की विवेच ना करना है।
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Pages:39-41
How to cite this article:
डॉ. तबस्सुम खान, वेदिका यादनलाल बनोठे "निराला का प्रगतिशील काव्य". International Journal of Hindi Research, Vol 9, Issue 1, 2023, Pages 39-41
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