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VOL. 9, ISSUE 3 (2023)
हिन्दी के असंगत नाटक व रंगमंच एक विश्लेषण
Authors
सोनम पाण्डेय
Abstract
हिन्दी साहित्य का आधुनिक काल कई नवीन विधाओं का जन्मदाता है। कहानी, उपन्यास नाटक व निबंध आदि अनेक विधाएँ इस युग की विशिष्ट देन है। इसी युग में असंगत नाटक भी लिखे गए हैं। असंगत नाटकों में मनुष्य के जीवन की नीरसता, निरर्थकता व अनास्था को दिखाया गया है। असंगत नाट्य लेखन की शुरुआत पाश्चात्य साहित्य से हुई है। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात मनुष्य का जीवन अधिक संत्रस्त हो चुका था। उसके सामने अस्तित्व का संकट उभरकर आया। मनुष्य के जीवन की इन विद्रूपताओं का चित्रण असंगत नाटकों में हुआ है। असंगत नाटक व्यक्ति के भीतरी यथार्थ को बखूबी व्यक्त करते हैं। इन नाटकों में परंपरागत मूल्यों के प्रति अनास्था है। असंगत नाटकों का रंगमंच प्रतीकात्मक होता है। यहाँ पात्रों की वेशभूषा, हाव-भाव व मंच सज्जा विशिष्ट अर्थ रखते हैं। यह परिवेश की असंगतता को दिखाने में सहायक होते हैं।
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Pages:9-10
How to cite this article:
सोनम पाण्डेय "हिन्दी के असंगत नाटक व रंगमंच एक विश्लेषण". International Journal of Hindi Research, Vol 9, Issue 3, 2023, Pages 9-10
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