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VOL. 10, ISSUE 1 (2024)
भक्ति काव्य में स्त्री-चेतना का स्वरूप
Authors
सुधांशु प्रकाश शुक्ल, वन्दना पाण्डेय
Abstract
भक्तिकाल को निःसंदेह हिन्दी साहित्य का स्वर्णकाल कहा जा सकता है। इस काल में उस समय की सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था सामंती सोच से आबद्ध थी, जिसमें स्त्री अपनी निम्नता के उत्तुंग शिखर पर विराज रही थी। वह केवल रूढ़िवादी सामंतों के हाथ की कठपुतली बन गई थी। मुगलों द्वारा स्त्री की अस्मिता को गहरा आघात पहुँचाया गया। भक्तिकालीन कवियों में तुलसी, सूर, कबीर, जायसी तथा मीराबाई आदि ने अपने काव्य के माध्यम से स्त्री चेतना को जगाने का प्रयास किया ताकि उसका स्तरोन्नयन हो सके व समाज में खोई प्रतिभा प्राप्त कर सके, जिसकी वह वास्तविक अधिकारिणी है।
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Pages:15-17
How to cite this article:
सुधांशु प्रकाश शुक्ल, वन्दना पाण्डेय "भक्ति काव्य में स्त्री-चेतना का स्वरूप". International Journal of Hindi Research, Vol 10, Issue 1, 2024, Pages 15-17
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