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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 10, ISSUE 3 (2024)
रामचरित मानस और स्त्री विमर्ष
Authors
कृष्णा
Abstract
मध्यकालीन साहित्य भारतीय समाज में रूढिवादिता और पुनर्जागरण काल का सीमान्त साहित्य है। इसमें कबीर, तुलसीदास, मीराबाई, रैदास, रसखान आदि ने समाज में व्याप्त रूढ़ियों का विरोध किया है। मध्यकालीन साहित्य में इन लोकनायकों ने बिना किसी भय के खुलकर समाज की रूढिवादिता का विरोध किया है। सामन्तषाही के समाज में तुलसीदास जी ने रामचरित मानस की रचना की तो कई धर्मगुरूओं ने उनका विरोध भी किया। तुलसीदास के मानस में स्त्री विमर्ष को लेकर कई विरोधाभास है और वह इसलिए है क्योंकि नारी विषयक जिन परिप्रेक्ष्यों को तुलसी ने छुआ है वह घटनाक्रम से जुडे है और विरोधियों ने उन बातों को प्रसंगवष ना समझ कर तुलसी के व्यक्तिगत विचारों के आधार पर समझने का प्रयास किया है। प्रस्तुत आलेख में तुलसीदास के रामचरित मानस में निहित इन्हीं नारी विमर्ष संबंधी परिप्रेक्ष्यों का विष्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
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Pages:37-38
How to cite this article:
कृष्णा "रामचरित मानस और स्त्री विमर्ष". International Journal of Hindi Research, Vol 10, Issue 3, 2024, Pages 37-38
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