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VOL. 11, ISSUE 1 (2025)
भूमंडलीकृत चक्रव्यूह में पिसता किसान: ‘बीज भोजी’ कहानी के संदर्भ में
Authors
डॉ. श्रीविद्या एन. टी, अन्जू सी
Abstract
भारत एक कृषि प्रधन देश है इसलिए भारत की जनता प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में कृषि से जुड़े हुए है। कृषि कार्य करनेवाले को मुख्य रूप से किसान कहा जाता है उन्हें कृषि कोई धंधा नहीं, उनकी जीवन शैली है, कोई व्यापार-व्यवसाय नहीं बल्कि उनका जीवन का हिस्सा है। किसान ने ही देश को देश बनाया था लेकिन अब वह सब कुछ खोकर नाम मात्र रह गया। भूमंडलीकृत समाज में किसान की शोषण एवं आत्महत्या ही अधिक सुनना पड़ता है। किसान आत्महत्यायें असल में कृषि क्षेत्र की यथार्थ स्थिति को व्यक्त करता है, संपन्न कहने वाला किसान की संपन्नता भी खोखली है। आज किसानों को घर की खाद की बजाय बाज़ार की खाद और घर की बीज के स्थान पर बाज़ार की बीज ही मिल रहे हैं। इन बीजों को बाज़ार में माँग बढ़ने के कारण दूकानदारों ने अपनी मन चाहे कीमत पर उसे बेच देते हैं। इस प्रकार भूमंडलीकरण अपनी रणनीति फैलाकर किसानों को मिटाते आ रहे हैं यह बात चिंतनीय है।
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Pages:29-31
How to cite this article:
डॉ. श्रीविद्या एन. टी, अन्जू सी "भूमंडलीकृत चक्रव्यूह में पिसता किसान: ‘बीज भोजी’ कहानी के संदर्भ में". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 1, 2025, Pages 29-31
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