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VOL. 12, ISSUE 1 (2026)
साहित्य और समाज का अन्तर्सम्बन्ध
Authors
डॉ. अनुपम मिश्र
Abstract
साहित्य और समाज एक दूसरे के पूरक हैं। समाज की गहन संरचना साहित्य तथा विभिन्न कलारूपों में प्रकट होती है। भाषा, संस्कृति, इतिहास, दर्शन तथा ज्ञान के विभिन्न अनुशासनों का संगम साहित्य में होता है और साहित्य समाज का उपजीव्य है। इसीलिए साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है। दर्पण में वही दृश्य-परिदृश्य दिखाई पड़ता है, जो उसके समक्ष होता है, जो समाज में घटित हो रहा होता है। अतः हम कह सकते हैं कि साहित्य और समाज में बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव होता है। साहित्य और साहित्यकार समष्टि और व्यष्टि का प्रतिनिधित्व करते हैं। साहित्य की विशेषता यह है कि यह व्यष्टि को समष्टि में लय कर देता है। इस तरह व्यक्ति-संवेदना, लोक- संवेदना के रूप में प्रकट होती है। लोक तथा समाज की संवेदना की अन्तर्भुक्ति साहित्य को यथार्थवादी और प्रामाणित बनाती है
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Pages:72-74
How to cite this article:
डॉ. अनुपम मिश्र "साहित्य और समाज का अन्तर्सम्बन्ध". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 1, 2026, Pages 72-74
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