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VOL. 12, ISSUE 1 (2026)
भारतीय ज्ञान परंपरा और शिवानी के उपन्यास
Authors
सलमान, आचार्य पी. राजरत्नम
Abstract
शिवानी (गौरा पंत) के उपन्यास भारतीय ज्ञान परंपरा की सजीव व्याख्या प्रस्तुत करते हैं, जहाँ धर्म, कर्त्तव्यबोध, लोकमूल्य, संस्कार और आत्मानुभूति जैसे तत्व स्त्री-पात्रों के जीवनानुभवों से गहराई से जुड़े हैं । भारतीय ज्ञान परंपरा केवल ग्रंथों तक सीमित न होकर लोकजीवन, अनुभव और आस्था में रची-बसी परंपरा है, जो सत्य, अहिंसा, संतुलन, करुणा और आत्मबोध को जीवन का केंद्र मानती है । शिवानी के प्रमुख उपन्यासों मायापुरी, चौदह फेरे, श्मशान चंपा, कृष्णकली, भैरवी आदि में स्त्री पात्र न केवल अपने सामाजिक व पारिवारिक कर्त्तव्यों का निर्वाह करती हैं, बल्कि आत्मसम्मान, त्याग और आत्मान्वेषण के माध्यम से जीवन के गहन सत्य को भी पहचानती हैं ।
उनके साहित्य में धर्म बाह्य क्रिया नहीं, बल्कि अंतःकरण की शुचिता और आत्मानुशासन है; संस्कार परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु का कार्य करते हैं । लोकजीवन, लोकगीत, लोकविश्वास और सांस्कृतिक चेतना उनके लेखन को भारतीय लोकबुद्धि से जोड़ते हैं । साथ ही, आत्मानुभूति और आध्यात्मिक दृष्टि उनके पात्रों को संघर्ष और पीड़ा से ऊपर उठकर आत्मबोध और मुक्ति की ओर ले जाती है । यह शोध सिद्ध करता है कि शिवानी की रचनाएँ भारतीय ज्ञान परंपरा का आधुनिक पुनर्पाठ हैं, जहाँ स्त्री की चेतना परंपरा को तोड़ती नहीं, बल्कि उसमें नई ऊर्जा, मूल्य और जीवन-दृष्टि का संचार करती है ।
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Pages:146-148
How to cite this article:
सलमान, आचार्य पी. राजरत्नम "भारतीय ज्ञान परंपरा और शिवानी के उपन्यास". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 1, 2026, Pages 146-148
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