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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 12, ISSUE 1 (2026)
लक्ष्मीनारायण रंगा के कथा-साहित्य में नारी विमर्श
Authors
विजयलक्ष्मी व्यास, डॉ. अशोक धारनिया
Abstract
लक्ष्मीनारायण रंगा की कहानियों में नारी जीवन के विभिन्न आयामों का उल्लेख मिलता है। उनकी कहानियों में पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन के उलझे तानों-बानों में अपने दायित्व निवर्हन के बोध व बोझ से दबी हुई, अपने अन्तरंग व बहिरंग घुटन और अन्तर्द्वन्द्वों से संघर्षरत नारी पात्रों के जीवंत चरित्र-चित्रण देखने को मिलते हैं। वर्तमान समय में कामकाजी महिला के रूप में नारी का कार्यक्षेत्र बढ़ गया है, उस पर अब घर और कार्यालय दोनों जगह संतुलन बनाये रखने की जिम्मेदारी है। नारी के कार्यक्षेत्र में विस्तार होने के बावजूद भी समाज अभी भी स्त्री-पुरूष में भेदभाव के आधार पर व्यवहाकर करता है। लैंगिक भेदभाव आज भी किसी न किसी रूप में नारी के लिए पीड़ा दायक है। रंगा के कहानी के नारी पात्रों में इसके विरूद्ध प्रतिरोध के स्वर भी सुनाई देते हैं। नारी को मात्र उपभोग की वस्तु मानने के विरूद्ध विद्रोही स्वर भी रंगा जी की कहानियों में सुनाई देता है। आज भी नारी के सहज हास-परिहास और जीवन शैली को समाज की दूषित व संकीर्ण सोच के कारण संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। उसके चरित्र पर प्रश्न चिह्न लगाया जाता है। परिवार और समाज में नारी को पुत्री, पत्नी, बहन और माता आदि के रूप में सम्मान और स्वीकृति मिलती है किन्तु इन संज्ञाओं से इतर एक नारी के रूप में उसकी स्थिति आज भी अनेक चुनौतियों से भरी हुई है। रंगा जी की कहानियों में दहेज, पर्दा प्रथा, बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराईयों पर कटाक्ष किया गया है और यह दिखाया गया है कि इन सामाजिक बुराईयों का मूल्य भी अन्ततः नारी को ही चुकाना पड़ता है। लक्ष्मीनारायण रंगा के कथा साहित्य में नारी विमर्श को इसी परिप्रेक्ष्य में विवेचना करने का प्रयास शोधार्थी द्वारा किया गया है।

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Pages:190-193
How to cite this article:
विजयलक्ष्मी व्यास, डॉ. अशोक धारनिया "लक्ष्मीनारायण रंगा के कथा-साहित्य में नारी विमर्श". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 1, 2026, Pages 190-193
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