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VOL. 12, ISSUE 2 (2026)
दलित साहित्य और आदिवासी साहित्य का अंतःसंबंध : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Authors
सोमनाथ, डॉ गीतू
Abstract
साहित्य की दुनिया में दलित और आदिवासी साहित्य की उपस्थिति स्त्री लेखन के बाद मानी जाती है। कई बार भ्रमवश और कई बार सायास दलित और आदिवासी साहित्य को एक ही मान लिया जाता है। इस प्रसंग में स्पष्टता के लिए दलित साहित्य और आदिवासी साहित्य के अंतःसंबंधों पर बात करना जरूरी है। भारतीय साहित्य की समृद्ध परंपरा में दलित और आदिवासी साहित्य दो ऐसी धाराएँ हैं, जिन्होंने लंबे समय तक हाशिए पर रखे गए समुदायों की आवाज़ को केंद्र में स्थापित किया है। दलित साहित्य और आदिवासी साहित्य कुछ कुछ एक दूसरे से भिन्न हो सकता है,लेकिन पूर्ण रूप से इन दोनों विधाओं को अलग- थलग नहीं दिखा सकते।इस लिए इन दोनों साहित्य विधाओं के अन्त: संबंधों का यहां वर्णन करने का प्रयास किया जाएगा। ये दोनों साहित्यिक प्रवृत्तियाँ सामाजिक असमानता, शोषण, सांस्कृतिक वर्चस्व और ऐतिहासिक अन्याय के विरुद्ध सशक्त प्रतिरोध प्रस्तुत करती हैं। दलित साहित्य जहाँ जाति-आधारित उत्पीड़न के अनुभवों को अभिव्यक्त करता है, वहीं आदिवासी साहित्य भूमि, प्रकृति और सांस्कृतिक अस्मिता के प्रश्नों को केंद्र में रखता है। प्रस्तुत शोध-पत्र में दोनों साहित्यिक धाराओं के अंतःसंबंध, उनकी समानताओं, भिन्नताओं, वैचारिक आधारों तथा समकालीन प्रासंगिकता का गहन विश्लेषण किया गया है।
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Pages:86-88
How to cite this article:
सोमनाथ, डॉ गीतू "दलित साहित्य और आदिवासी साहित्य का अंतःसंबंध : एक आलोचनात्मक अध्ययन". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 2, 2026, Pages 86-88
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