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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 12, ISSUE 2 (2026)
प्रागैतिहासिक काल एवं वैदिक काल में भारतीय स्त्री की स्थिति
Authors
Dr. Susmita Sen
Abstract
स्त्री और पुरुष यह दोनों इकाई इस पृथ्वी में सृष्टि को आगे बढ़ाने में सहायता करते हैं। सृष्टि दोनों का त्याग एवं समर्पण समान रूप से चाहता है, दोनों प्राणियों के शारीरिक एवं मानसिक भिन्नता के बिना सृजन प्रक्रिया असंभव है। एक मानवीय इकाई के रूप में सभ्यता और संस्कृति के हर स्तर के विकास में स्त्री की भागीदारी अनिवार्य है। ज्यों-ज्यों सभ्यता का विकास हुआ स्त्री की स्थिति में पराधीनता बढ़ती गयी, उसे वस्तु की संज्ञा मिलती रही और अंत में मनोरंजन का एक सामग्री बना दिया गया। पितृसत्ता ने उसके पर्दे में रहने को ही उसका सतीत्व माना, घर के चार दीवारों के बीच उसे सुरक्षित बताया। परंतु उस चारदीवारी के अत्याचार असहनीय थे। उसको शिक्षा से भी वंचित रखा गया। स्त्री के हर निस्वार्थ भाव का सिर्फ फायदा उठाया गया और उसे यह मानने में बाध्य किया गया कि वह पुरुष उसका मालिक है। परंतु स्त्री की स्थिति जो आज है वह प्रारंभ से नहीं थी। आलेख में प्रागैतिहासिक काल और वैदिक काल में स्त्री के अवस्था पर चर्चा किया गया है।
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Pages:120-123
How to cite this article:
Dr. Susmita Sen "प्रागैतिहासिक काल एवं वैदिक काल में भारतीय स्त्री की स्थिति". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 2, 2026, Pages 120-123
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