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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 12, ISSUE 3 (2026)
बघेली मिथकीय परम्परा में पौराणिक चरित्र
Authors
करुणा सिंह, डॉ. प्रदीपकुमार विश्वकर्मा
Abstract
भारतीय लोकभाषाओं मेंया पुराणों में किसी भी समाज के जीवंत रहने के लिए आवश्यक प्रणाली, यथा आचार-विचार, मर्यादित व्यवस्था, लोक व्यवहार, सामाजिक सुगठन, नैतिक मूल्य आदिपर व्यापक विमर्श है। लोक हो या पुराण दोनों ही जगह संबंधित कथाओं के हवाले इनके रचनाकारों ने अपनी बात स्पष्ट करने, उनका प्रमाण प्रस्तुत करने के लिए इनमें स्थान-स्थान पर अनेक कथा-प्रसंगों को पिरोया है। ये सभी आख्यान न केवल तत्कालीन समाज का दर्पण हैं बल्कि गंभीर अध्येता और समान्य पाठक दोनों के लिए समान उपयोगी है । 
लोक की मिथकीय परम्परा में पौराणिक चरित्रों के रूप में पिरोये गए देव, दानव, ऋषि, मुनि, नाग, किन्नर, गंधर्व, अप्सराएँ, चक्रवर्ती सम्राट, महराजा, राजा, विभिन्न तरह के खल और समान्य नागरिक आदि मानव जगत के ही तो हैं । इन कथाओं में पशु-पक्षी, नदियां, पहाड़, वृक्ष आदि भी ऐसे मानवीय और उदात्त स्वरूप में समाने आते हैं कि पाठक विस्मय विमुग्ध हो जाता है । पौराणिक कथाएँ जब लोक में उतरती हैं तो उनमें निहित चरित्रों के खल स्वाभाव को भी लोक बिना लाग-लपेट के अपनी कहन में जोड़ता है यही लोक की लोक होने और बने रहने की सबसे बड़ी पहचान है । 
इन तत्कालीन रचनाकारों की अद्भुत कल्पना शक्ति कहें या तत्कालीन उन्नत समाज का प्रमाण कि इसमें वायु में विचरण करने वाले विमान हैं तो सेतु बनाने की तकनीक भी । मनुष्य पशु-पक्षियों से बतियाता भी है तो वह एक दूसरे की सहायता भी करते हैं । तब के विध्वंसक अस्त्र-शस्त्रों और आज के अनेक विकसित हथियारों से साम्य है । लोक की मिथकीय परम्परा या पुरा-कथाओं में मन की गति से यात्रा करने की बात है जिसका जवाब हमारे आज के विज्ञान के पास भी नही है । 
इन तमाम मिथकीय अख्यानों में महज कल्पना की ऊंची उड़ान नहीं है, बल्कि मनुष्य के दैनंदिन जीवन में उपयोगी अनेक ऐसे सूत्र भी सहजता से गुंथे हुए हैं, जो आचरण में उतारे जाने पर किसी को भी मनुष्य श्रेष्ठ बनाने में सक्षम हैं। 

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Pages:6-8
How to cite this article:
करुणा सिंह, डॉ. प्रदीपकुमार विश्वकर्मा "बघेली मिथकीय परम्परा में पौराणिक चरित्र". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 3, 2026, Pages 6-8
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