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VOL. 12, ISSUE 3 (2026)
सहजोबाई की ‘सोलह तिथियाँ’ में आध्यात्मिक चेतना और जीवन-दर्शन
Authors
डॉ. रूपधर गोमांगो
Abstract
हिंदी संत काव्य परंपरा में सहजोबाई का काव्य अपनी सहज साधना-दृष्टि, गुरु-निष्ठा, ज्ञान, भक्ति, वैराग्य और आत्मानुभूति के कारण विशिष्ट महत्त्व रखता है। चरणदासी संत परंपरा से संबद्ध सहजोबाई ने अपने काव्य में आध्यात्मिक अनुभूतियों को लोकजीवन में प्रचलित प्रतीकों और व्यवहारों के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। उनकी रचनात्मकता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष ‘सोलह तिथियाँ’ है, जिसमें चंद्रमा की कलाओं और तिथियों को आधार बनाकर साधक के आध्यात्मिक विकास के विभिन्न सोपानों को अभिव्यक्त किया गया है।
‘सोलह तिथियाँ’ का मूल स्वरूप केवल तिथियों का धार्मिक अथवा ज्योतिषीय विवरण नहीं है। सहजोबाई प्रत्येक तिथि के नाम अथवा प्रथम अक्षर को आधार बनाकर उसके साथ किसी पारमार्थिक तत्व को जोड़ती हैं। अमावस्या के अज्ञान-अंधकार से आरंभ होकर पूर्णिमा के ज्ञान-प्रकाश तक पहुँचने वाली यह यात्रा वस्तुतः जीव की आध्यात्मिक उन्नति की यात्रा है। इसमें नाम-स्मरण, मानव-जन्म की सार्थकता, साधु-संगति, इंद्रिय-संयम, चक्र-साधना, सत्संग, योग, ध्यान, तत्त्वज्ञान, इंद्रिय-निग्रह, आसक्ति-त्याग, देह की नश्वरता, मुक्ति की आकांक्षा तथा सद्गुरु की कृपा जैसे विविध आध्यात्मिक पक्ष क्रमशः उद्घाटित होते हैं।
सहजोबाई की दृष्टि में चंद्रमा की बढ़ती हुई ज्योति जीव की चेतना में बढ़ते हुए ज्ञान का प्रतीक है। जिस प्रकार अमावस्या के अंधकार से पूर्णिमा के पूर्ण प्रकाश तक चंद्रमा की यात्रा होती है, उसी प्रकार अज्ञान में डूबा जीव सद्गुरु के मार्गदर्शन, नाम-स्मरण और साधना के द्वारा आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होता है। इस प्रकार ‘सोलह तिथियाँ’ समय और साधना, लोक और अध्यात्म, देह और आत्मा, अज्ञान और ज्ञान तथा संसार और परमार्थ के बीच एक सार्थक संवाद स्थापित करती हैं।
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Pages:185-190
How to cite this article:
डॉ. रूपधर गोमांगो "सहजोबाई की ‘सोलह तिथियाँ’ में आध्यात्मिक चेतना और जीवन-दर्शन". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 3, 2026, Pages 185-190
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