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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 12, ISSUE 4 (2026)
कबीरदास एवं ईसरदास के भक्ति काव्य में नाम-साधना एवं नाम-महिमा : एक तुलनात्मक अध्ययन
Authors
आसुसिंह
Abstract
मध्यकालीन भारतीय भक्ति-काव्य में ‘नाम’ साधना, भक्ति एवं आध्यात्मिक अनुभूति का अत्यंत महत्त्वपूर्ण आधार रहा है। भक्त कवियों ने नाम को केवल ईष्वर के संबोधन के रूप में स्वीकार नहीं किया, बल्कि उसे आत्मशुद्धि, ईष्वर-स्मरण, प्रेम, ज्ञान, वैराग्य और मोक्ष का सहज साधन माना है। कबीरदास और ईसरदास दोनों के काव्य में नाम-साधना की केंद्रीय भूमिका दृष्टिगत होती है, यद्यपि दोनों कवियों की दार्शनिक पृष्ठभूमि एवं काव्याभिव्यक्ति में पर्याप्त भिन्नता है।
कबीरदास की ‘सुमिरण कौ अंग’ संबंधी साखियों में राम-नाम को ‘ततसार’, ‘निज सार’ और समस्त साधना का सार कहा गया है। वे मनसा, वाचा और कर्मणा नाम-स्मरण पर बल देते हैं। उनके लिए नाम-साधना बाह्य कर्मकांड की अपेक्षा अंतःकरण की शुद्धि, आत्मबोध और परम सत्ता के अनुभव का माध्यम है। दूसरी ओर ईसरदास के हरिरस में नाम-महिमा का अत्यंत व्यापक और भक्तिपरक विवेचन मिलता है। हरिरस में नाम को वेद-शास्त्र-पुराण का सार, तीर्थ-व्रत-जप-तप से श्रेष्ठ, पाप-विनाशक, भवसागर से पार लगाने वाला और मोक्षदायक बताया गया है।
प्रस्तुत शोध में दोनों कवियों के नाम-संबंधी विचारों का अध्ययन नाम को तत्त्व-सार, नाम-स्मरण, भक्ति, प्रेम, चित्त की एकाग्रता, पाप-विनाश, मोह-निवारण, मृत्यु-बोध, मुक्ति, पौराणिक संदर्भ और ईष्वर के विविध नाम-रूपों के आधार पर किया गया है। अंत में दोनों कवियों की नाम-साधना के साम्य एवं वैषम्य का स्वतंत्र तुलनात्मक विवेचन प्रस्तुत किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि दोनों कवियों के लिए नाम साधना का केंद्रीय तत्व है, किंतु कबीर के यहाँ नाम अधिक अंतर्मुखी, अनुभवप्रधान और निर्गुण-ब्रह्म की अनुभूति से संबद्ध है, जबकि ईसरदास के यहाँ नाम विष्णु-भक्ति, पौराणिक आख्यान और सगुण भक्तिपरंपरा के साथ अधिक विस्तार प्राप्त करता है।

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Pages:1-5
How to cite this article:
आसुसिंह "कबीरदास एवं ईसरदास के भक्ति काव्य में नाम-साधना एवं नाम-महिमा : एक तुलनात्मक अध्ययन". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 4, 2026, Pages 1-5

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