Logo
International Journal of
Hindi Research
ARCHIVES
VOL. 12, ISSUE 4 (2026)
मथुरा कला का ऐतिहासिक विकास एवं प्रमुख विशेषताएँ
Authors
डॉ. शालिनी
Abstract
भारतीय कला एवं संस्कृति के इतिहास में मथुरा कला का महत्वपूर्ण स्थान है। मथुरा प्राचीन काल से ही भारतीय धर्म, संस्कृति, व्यापार तथा मूर्तिकला का प्रमुख केंद्र रहा है। इसकी ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक परंपरा अत्यंत प्राचीन है। पौराणिक परंपराओं में मथुरा को मधु, मधुपुरी तथा मधुवन से जोड़ा गया है। आगे चलकर यह शूरसेन जनपद की प्रमुख नगरी के रूप में विकसित हुई तथा बौद्ध, जैन और ब्राह्मण धार्मिक परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र बनी।
मथुरा की स्थानीय मूर्तिकला परंपरा का विकास प्रारंभिक यक्ष-यक्षिणी प्रतिमाओं से हुआ और आगे चलकर मौर्य, शुंग, कुषाण तथा गुप्त काल में इसका क्रमिक विकास हुआ। प्रारंभिक बौद्ध कला में बुद्ध को मानव रूप में प्रस्तुत करने के स्थान पर बोधिवृक्ष, धर्मचक्र, स्तूप तथा चरण-चिह्न जैसे प्रतीकों के माध्यम से उनकी उपस्थिति व्यक्त की जाती थी। कुषाण काल में मथुरा एक प्रमुख मूर्तिकला केंद्र के रूप में विकसित हुआ और बुद्ध की मानवाकार प्रतिमाओं के साथ जैन तीर्थंकरों तथा ब्राह्मण परंपरा के देवी-देवताओं की प्रतिमाओं का भी निर्माण हुआ।
मथुरा कला की प्रमुख विशेषताओं में लाल चित्तीदार बलुआ पत्थर का प्रयोग, सशक्त एवं सजीव मानव आकृतियाँ, यक्ष परंपरा का प्रभाव, भावाभिव्यक्ति, शरीर से जुड़े पतले वस्त्र, प्रभामंडल, विभिन्न मुद्राएँ, स्त्री सौंदर्य का चित्रण तथा भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का अंकन प्रमुख हैं। गुप्त काल में मथुरा की पूर्ववर्ती परंपराओं को अधिक सौम्य, संतुलित एवं आध्यात्मिक रूप प्राप्त हुआ। इस प्रकार मथुरा कला ने भारतीय मूर्तिकला के विकास में दीर्घकालीन योगदान दिया।

Download
Pages:31-34
How to cite this article:
डॉ. शालिनी "मथुरा कला का ऐतिहासिक विकास एवं प्रमुख विशेषताएँ". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 4, 2026, Pages 31-34

Please enter the email address corresponding to this article submission.

मथुरा कला का ऐतिहासिक विकास एवं प्रमुख विशेषताएँ | International Journal of Hindi Research